Tuesday, March 28, 2017

मोको कहाँ ढूंढे रे बन्दे


मोको कहाँ ढूंढे रे बन्दे, मैं तो तेरे पास में
ना तीरथ में ना मूरत में, ना एकांत निवास में
ना मन्दिर में ना मस्जिद में, ना काबे कैलास में
मैं तो तेरे पास में बन्दे, मैं तो तेरे पास में
ना मैं जप मैं ना मैं तप में, ना मैं बरत उपास में
ना में क्रिया करम में रहता, नहिं जोग सन्यास में
नहिं पिंड में नहिं अंड में, ना ब्रहमांड आकाश में
ना मैं प्रकटी भंवर गुफा में, सब स्वांसों की स्वांस में
खोजी होए तुंरत मिल जाऊ, इक पल की तलाश में
कहत कबीर सुनो भई साधो, मैं तो हूँ विश्वास में
-कबीर 

मोको कहाँ ढूंढे रे बन्दे

Monday, March 27, 2017

शायरी

तुम्हारी आसपास होना ,
मेरा चाल बदल देता है ।

देख लू कहीं दूर तो
राह  बदल देता हूं ।

सामने तुम आ जाती हो ,
पर लब्ज नहीं आते।

धधक जाता हूं फिर मैं,
जब तुम्हारे दीदार हो जाते ।

Sunday, March 26, 2017

Freedom


जहंवा से आयो अमर वह देसवा।

जहंवा से आयो अमर वह देसवा।
पवन पानी न धरती अकसवा चाँद न सूर न रैन दिवसवा।
ब्राह्मण छत्री न सुद बैसवा, मुग़ल पठान न सयद सेखवा।
आदि जोत नहिं गौर गनेसवा , ब्रह्मा बिस्नु महेस न सेसवा।
जोगी न जंगम मुनि दरवेसवा , आदि न अंत न काल कलेसवा।
दास कबीर ले आये संदेसवा , सार सबद गहि चलो  वा देसवा।

- संत कबीर

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हमन है इश्क मस्ताना

हमन है इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या ?
रहें आजाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या ? 
जो बिछुड़े हैं पियारे से, भटकते दर-ब-दर फिरते,
हमारा यार है हम में हमन को इंतजारी क्या ?
न पल बिछुड़े पिया हमसे न हम बिछड़े पियारे से,
उन्हीं से नेह लागी है, हमन को बेकरारी क्या ?
कबीरा इश्क का माता, दुई को दूर कर दिल से,
जो चलना राह नाज़ुक है, हमन सिर बोझ भारी क्या ?


- संत कबीर 







तू ही तू

नित नित , पल पल तू ही तू है ,
पथ पथ , घट घट तू ही तू है ।
नयन - दृश्य में , नाद - गंध में ,
तन में , मन में , धन में तू है ।
मृत्यु में तू , अभिमान में तू है।
भुत भविष्य वर्तमान में तू है,
काल भी तू , विकराल भी तू है।
तू पापी में , तू चोरो में।
तू योगी में , तू भोगी में ।
तू है धनी में , तू निर्धन में,
दमन भी करता , दान भी देता,
चोरी कर के , पकड़ भी लेता।
तू ही सखा है , तू ही दुश्मन ,
मदर करे तू, तू संकट दे ।
तू ही हंसाये , तू ही रुराये ,
करे अनाथ , और तू ही पाले ।
राम भी तू , रावण भी तू ,
भादो तू ,सावन भी तू।
अमावस का तू घोर अँधेरा,
सूरज का प्रकाश भी तू है।
तारो की जगमग में तू है ,
भवरों की गुंजन में तू।
तेरा प्रपंच तेरी है लीला
तू ही दर्शक तू ही खेला
तू ही हारे, जीते भी तूही ,
तू ही मनाये , रूठे भी तू ही।
तेरे होने से ही माया ,
काम , क्रोध, मद, लोभ ।
तेरे होने से ही मुक्ति
योग , समाधी , भोग ।
सब चलत है , तेरे होने से,
समझत भी तू , भटकत भी तू।

- वागीश (३१ अक्टूबर २०१६  )

Shayri

तेरे हुस्न को शब्दो का अलंकार फीका है ,
तेरे दीदार से वाकिफ हूऐ , तो प्यार सिखा है।
तेरी गलियों से गुजराता तो निहारती मेरी आँखे, 
किस परदे के पीछे, मेरा प्यार छिपा है।

- वागीश (२ दिसम्बर २०१६ )




अकेलापन

इस अकेलेपन में मै , अवाक् रह गया,
मिला एक ठहराव , जब खुद से रूबरू हुआ।
मिलता न था खुद से , तन्हाई से डरता था,
पर कबसे लिए बक्शीस वो दरख्त पे खड़ा था।
अब सांसो में बसता हु, खुद में मस्त रहता हूं,
सागर लिए घट में, जो पल पल भटकता था।

- वागीश (३ दिसम्बर २०१६  )


हो अगर मिटने की तलब

हो अगर मिटने की तलब,
हो अगर मरने ही ख्वाहिश।
अकेले चलने में कोई लाज न हो तो,
किसी के समर्थन की परवाह न हो तो।
विचारों की छमता जो जान गए,
यादों की परिधि जो पहचान गए।
कमान का भ्रम जो टूट गया,
राहों के चक्कर से जो छूट गया।
बाहर से जो मिले वो झूठ लगे,
अंदर में डूब के अब आराम मिले।
विशेष बनाने में कोई रास न हो,
देखने में ही स्वरसपान मिले।

- वागीश (१३ दिसम्बर २०१६  )


ROBOT LIFE

है कितने अरमान लिए,
नित पल बुनते ख्वाब नए।
मन को मार के कुछ न मिला,
उठता फिर वो उफान लिए।
बन के पथिक कुछ भी न मिला,
स्मृति, कल्पना का बोझा ढ़ोते चलें।
करके कितना देखा अबतक,
हम वर्तमान  को खोते चलें।
क्या पाना कुछ जाना नहीं ,
बदलूंगा खुद को उनकी तरह।
मेरा जीवन दर्पण देखा न कभी ,
चलता अब इंजन की तरह।
- वागीश (१८ दिसम्बर २०१६  )

क्या होता जो

क्या होता जो नंगे होते,
क्या होता तो छत पे सोते।
हर पीड़ा में रो लेते हम,
पास नदी में खा लेतें गोते।
क्या होता जो चाह न होती,
लोगों की परवाह न होती।
प्रतिस्पर्धा में फस न जातें,
खुद के "मैं"पन से मर जातें।
क्या होता जो कोई जात न होती,
धर्म - राजनीती की बात न होती।
ज्ञान भ्रम से हटकर जो हम,
नित जीवन प्रवाह में होतें।

- वागीश (१ जनवरी २०१७ )

सहज

मैं आज़ाद छोड़ता हु तुमको ,
तेरे पंखों के करतब दिखला।
कब तक जियेगा कृमिकोष में,
निकल जरा तितली बन जा।
उड़ जा तू अज्ञात गगन में,
कर ले जो तू आये मन में।
अब यादों से मत जीना तू,
इस पल जो भाये पीना तू।
राह वाही चल जो लगे नविन ,
पुराना सब दे त्याग हिन।
बंधन नहीं कोई तुझपे अब,
पाप पुण्य से न कोई मतलब।
जो स्वयं के पास ले जाये ,
वाही कर्म सदा करना तू ।
जीवन सहज सरल है,
खुद  से न कभी लड़ना तू ।

- वागीश (४ जनवरी २०१७ )


बचपना

सयानेपन की निशानी गंभीरता नहीं,
किसी को दबाने में कोई वीरता नहीं।
तुम्हारे होने से दो लोग जो मुस्कुरा दिए, 
जो बचपने में है वो और कहीं, शालीनता नहीं।

-वागीश 

SURRENDER

आज फिर वो टूट गया , जो कल सायना था,
वक्त की चोट से भला कौन बचा है ।
कल अकड़ में जो चला था दुनिया बदलने को,
आज वो चादर लिए मजार पे खड़ा है ।
इस द्वैत की माया का तनिक भी भरोसा क्या,
क्षण  धुप पल छांव जीवन है अनोखा सा।
बस पात्र बन जाओ , स्वतंत्र भान हो हरदम,
तुमको बना के वाद्य , छेड़े कुदरत ही सब सरगम।

- वागीश (८ जनवरी २०१७ )

जीवन लक्ष्य

तुम पूछते हो जीवन में लक्ष्य क्या  है ?
तुमने फूलों को पूछा है वो क्यों खिलते है?
तुमने झरनों को पूछा है यो क्यों बहते है?
तुमने बाजों को देखा है बिना हिले ऊँचे आकाश में रमते हुए,
भौरों को देखा है हर फूल को चूमते हुए।
ये सब बस जीवन के सहज प्रवाह में बहते है । 


- वागीश (९ जनवरी २०१७ )



ओह रे सखी

ओह रे सखी मै तो दिल हार आई ,
अब कुछ चैन नाही, परान छटपटाई ।
मोके महल नहीं सखी , नहीं ठाट बाट कुछु,
मोके केवल प्रियतम के दरश ही चाही।
करू कैसे श्रृंगार सखी, सुध नहीं तन के बा,
भूख पियास अब हमरे नहीं बस में बा।
बावरी कहे अब दुनिया , कवनो परवाह नाहीँ
जोगिन भइनी हम , प्रेम रस पायीं।
- वागीश (९ जनवरी २०१७ )


प्रेम विरह गीत

बस एक नाम नहीं दूंगी  , इस रिश्ते को सनम,
कोई फरियाद न होगी , न कोई कसम।
तुम जानो या न जानो , मेरे सभी तुम्ही हो,
परवाह नहीं किसी की , जन्नत मिले या गम।
बस एक नाम .....
सौ फासलें हो फिर भी , तुम ही तो रगों में,
सजाई सेज बैठी , ताकू राह मैं जतन में ।
इस बिरहा में पूरी हुई मै, जग लागे मोहे भरम,
बस एक नाम नहीं दूंगी , इस रिश्ते को सनम।
बस एक नाम .....

--वागीश (१४ जनवरी २०१७ )



काफिले चले कई

काफिले चले कई , कई राह बन गए,
कई राह घर बसा , काम में उलझ गए।
कई भीड़ में चले, थी न कुछ उन्हें खबर,
कई काज कर चुके, जिंदगी है बेअसर।
आज भी वही हैं, कल थे जहाँ से चले,
मंजिले मिली नहीं , राह भी भटक गये।
जो चले थे एकले, खुद की राह को बना,
देर से ही मगर , मंजिलें उन्हें मिलें।

-वागीश (१६ जनवरी २०१७ )

अकेला पथिक 

Random poem

बस हुई , हां बस हुई,
छोड़ तो कोशिश , क्योकि हारोगे।
छोड़ दो फरियाद,
क्योकि गलत ही सोच बैठे हो।
सोचने से नहीं होने वाला,
न करने से होने वाला।
कृपा की देन है , तो तैयार रहो,
खाली बनकर, एकदम खाली।
इतना रिक्त हो जाओ कि,
खुद ही धड़कन सुन सको।
इतने अव्यस्त हो जाओ कि,
आसमान को घंटो निहार सको।
तुम इस संसार को बदलने नहीं आये हो,
तुम्हे खुद के लिए भी कुछ करना नहीं है।
बस बहो , बस बहो , बस बहो ,
सांय-सांय करते हुए निकल जाओ बागियों से,
चलो कन्दराओं में, जंगलो में,
समुन्दर की तुम्हारा मुकद्दर है,
आखिर कल तो मिटना ही है l

-वागीश (१९ जनवरी २०१७ )

नदी का सागर में मिलन 

भरम (ignorance)

चैन छुड़ा दे पल में सबकी, 
मरुस्थल में दे दर्श अनल की।
सुख का इशारा वहां दिखाएँ, 
जहाँ न हम कुछ शाश्वत पाएँ।
सबपर इसकी सत्ता ऐसी,
भुला दिया पहचान स्वयम की।
स्वयम भुला के फिर भी माना,
प्रतिभा औ अभिमान दे डाला।
फिर संसार में रस को दिखाया,
चक्कर में कुछ ऐसा फसाया।
नौकरी, छोकरी, शोहरत, नाम,
धन, वैभव, पदवी और काम।


- वागीश (२० जनवरी २०१७)

mirage in desert


प्रेम गीत

आँखों से ख़ुमारी का शराब बह रहा, 
ह्रदय भी मासूक का ही गीत कह रहा।
मेरे प्रेम का अब कोई इरादा नहीं रहा,
दुनिया का कोई अब सितम ज्यादा नहीं रहा।
नहीं दूर तू मुझसे , अब तनहाईयों में भी ,
मुकम्मल हूँ मैं तेरे , जुदाईयोँ में भी ।
आँख जो मिल जाएं तो ग़ुबार आ जाये,
उलझा हुआ मन , इस जहाँ के पार हो जाये।


- वागीश (२१ जनवरी २०१७ )




विरह गीत

काहे भइले इतना सखी , कौन क्याब खोयल बाड़ू,
केकरा के रंग रास में तू , भूक प्यास के भुलल बाड़ू।
पल पल मारेलू किलकारी, अब कुछू बोले नाही,
कौन रोग धरले बा सखी के, अब डोले नहीं ।
रोग नहीं सखी हमके, नाही कौनों मरम बाटे,
लोग चाहे पागल कहें , नहीं कुछ सरम बाटे,
गोदना गोदायी लिहनी ,उनकर नाम हम कलाई पे,
धरीं बाट दिन-रात, कर शृंगार , मेहँदी लगाइके।
झुलाना, घूमना हमके नाही अब भावेला,
उठी - सुति खली उनकर बिचार अब आवेला।
सावन हो, भादो हो, रोपना , कटाई,
रही रही खाली उनकर याद हमके खाई।
मांगू दुहाई काली माई से , तू इससे दूर रहा,
प्यार भइल जब भी, कबहु झेल न बिरहा।

- वागीश (२४ जनवरी २०१७ )


ऐसी खेली होली की

ऐसी खेली होली की,
मेरा सारा रंग निखर सा गया।
मेरे कोरे कोरे जीवन में,
रंग भगवा सा जकड़ सा गया।
ऐसी नाची पिया के संग,
तन-मन मेरा बिखर सा गया।
बिन खाये भांग, बिन पिए मदिरा,
मुझे तेरा नशा चढ़ सा गया।

- वागीश (११ मार्च २०१७ )



nothing

आपको motivation की जरुरत होती गई फौजी बनने के लिए।
आपको motivation की जरुरत होती है खिलाडी बनने के लिए ।
मगर आपको calling की जरुरत होती है artist बनने के लिए ।
और आपको किसी की जरुरत नहीं होती खुद को जानने के लिए ।
#nothing #nothing


इस जीवन को अब तू ही चला

मेरा रूह रूह पुकारे,
मेरा रोम रोम झनकारे।
मई तो मन से जान न पाया ,
मन हारा , अब तो दरश दिखा रे।
खुशबू की गंध बहुत ली,
अब फूल का रूप दिखा दे।
लिए सागर घट में बैठा,
इस प्यासे का भरम मिटा दे।
मुझे अपने आगोश ले , कर दे फनाह,
मेरी हस्ती मिटा , मुझे कर दे तबाह।
बहने दो हरपल निर्झर सा,
इस जीवन को अब तू ही चला।
- वागीश (११ मार्च २०१७ )

image courtesy: Google search (Parvathy Baul)

कैसा रंग मेरे गुरु ने डाला

कैसा रंग मेरे गुरु ने डाला , धोने से भी न छुटे अंग से,
जो आये कोई पास तेरे , रंग जाय वो भी तेरे रंग से ।
तूने होली ऐसी खेली, जनमो के नींद से जागन लागु,
किया तूने दहन भरम का, हर पल जिन्दा लागन लागु। 

वागीश (March 12 २०१७ )





वो मिला ही है?

क्या कोई क्रिया है, या कोई विधि ,
या कोई अनुभव है, या कोई स्तिथि ?
मुझे जानना है मन से, या मन से परे है,
यह प्रक्रिया है निरंतर, या बस यहीं  घडी है?
यह कृपा की देन है, या कर्म का प्रभाव,
क्या भक्ति की कमी है , या ज्ञान का आभाव?
या सब खेल और लीला ही है ?
तड़प रहा हु और वो मिला ही है?

वागीश (October 30, 2016)


कही यु ही जिंदगी गुजर न जाये

कही यु ही जिंदगी गुजर न जाये,
देखकर औरो को, सपने बनाने में,
कद दिखाने में, चंद पैसे कमाने में ।
कट रहा है वक्त, संसार के प्रपंच में,
छोड़कर जाना सभी है ,इस जीवन के अंत में।
जितना बटोरेगा रे मूरख ,
भूख सेे ज्यादा क्या खायेगा।
नित पल ऐसे जीता है जैसे की,
तू अमर रह जायेगा।
एक जीवन है, एक जवानी,
जोगने का ? की  भोगने का ?
ऐसा न हो जब होश आये ,
समय न हो चेतने का।
- वागीश (October 29, 2016)


मेरे गुरुदेव

मेरे गुरुदेव 

Mere Gurudev, charanon par sumana shraddha ke arpita hai
Tere hee dena hai jo hai, Wahi tujha ko samarapita hai
(My Gurudev I offer these flowers of my faith at your feet
Whatever I have, you have given to me, and I dedicate it all to you.)
Na priti hai pratiti hai, na hi puja ki shakti hai
Meraa yaha man, meraa yaha tan, meraa kan kan samarapita hai
(I have no love, nor do I know you.
I don't even have the strength to worship you,
But this mind of mine, this body of mine,
my every atom is dedicated to you.)
Tuma hee ho bhaava men mere, vicharon mein, pukaron mein.
Banaale yantra ab mujhko mere saravatra samarapita hai
(You are the only one in my heart and my thoughts.
You are the one who I call out to.
Now Make me your instrumentall I am I offer to you)


भक्ति का वर देना प्रभु

भक्ति का वर देना प्रभु , तेरे सिवा कोई चाह न हो ,
न जानू मै कोई मार्ग प्रभु , तू जिसपे चलाये राह वो हो |
समर्पन हो जाए सब तुजको, ऐसी कृपा कर दे पालक , 
मेरा जीवन डोर तुझे अर्पण , मै कठपुतली तू संचालक |


- वागीश 


लाखों हैं तेरे चाहने वाले


लाखों हैं तेरे चाहने वाले , मैं  कैसे तुझे पा  जाऊंगा,
है अच्छे मुझसे कितने भी , मैं  कैसे तुझे बुलाऊंगा । 
तुझे पाने के मैं  योग्य नहीं, ऐसा क्यों मन कहता है ?
निर्मल  नहीं मैं  बालक सा , मन वासनाओ में रहता है । 
कृपा कर प्रभु इस मन से ही, दे दे  मुझको अब छुटकारा,
ले ले सरणागत अब मुझको , मिट जाये "मैं "पन सारा।  
जो तेरी इच्छा वो मेरी इच्छा , न रह जाये कोई चाह मेरी,
सत्य प्रकट हो अब इसमें , रहूँ बस तेरे प्यार की राहत में। 
इस जीवन में दे लक्ष्य तेरा , उत्साह तेरा, दे जोश तेरा,
दे दे मुझको तेरी खुमारी,दे ध्यान  तेरा , दे होश तेरा।

- वागीश 





ना दौलत में, न सोहरत में

ना दौलत में, न सोहरत में,
न भुत, भविस्य काल में।
न पद में, न प्रशंसा में ,
असली सुख मिलेगा राम में।
काम , क्रोध ने खूब नचाया,
माया ने भी खूब लुभाया।
इस चक्कर को छोड़ रे मनवा,
अब तो रम जा राम में ।
भवसागर में गोते खाता,
दो पाटन में पिसता जाता।
अब तो चढ़ जा गुरु की नौका,
पार लगाएंगे राम रे।
कितना भी कोशिश कर ले,
बाहर में न ढूंढ सकेगा।
न पूजा, न कर्मकांड में,
वो तो हृदय के वास में।

- वागीश


Saturday, March 25, 2017

न पता है उद्गम


न पता है उद्गम ,न ही अंत का भान है,
न पता खुद का मुझे, फिर भी मुझे अभिमान है।
आज जो हु वो मेरे कर्म का परिणाम है,
 या कर्म के पीछे, कर्ता कोई भगवान है।
 ढूंढता हु आँख से, अदृश्य है या मिला नहीं,
गंध ,स्पर्श और न नाद में, न ही जिव्या के स्वाद में ।
 मन की सिमितताओ से उसमे न डूब पाउँगा,
आजादी मिलेगी मुझे या खूद से आजाद हो जाऊंगा।
न कोई खोज है, न कोई खोजने वाला,
 न कोई लक्ष्य है न कोई पथिक।
सब होता है ,करने वाला कोई नहीं,
 इस पल में ही सत्य है,और केवल सत्य है।

 - वागीश